पितृ पक्ष पर उत्तराखंड के नारायणी शिला में पूजा करने से मिलता है पितरों को मोक्ष, जानिए पौराणिक मान्यता

नारायण शिला मंदिर में श्राद्ध, तर्पण-पिंडदान करने पर पितरों को मिलता है मोक्ष,गयासुर राक्षस और भगवान विष्णु से जुड़ी है कथा, रिपोर्ट- सचिन कुमार

हरिद्वार: पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना का 16 दिवसीय पितृ पक्ष शुरू हो गया है. धर्मनगरी हरिद्वार में पितृ कर्म के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी. हरिद्वार के मायापुर स्थित नारायणी शिला मंदिर में देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. मंदिर में नारायण बलि पूजा समेत अन्य पितृ कर्म भी कराए जाते हैं. पितृ पक्ष के दौरान नारायणी शिला पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है.

तीनों स्थलों पर पितरों के कर्मकांड का विशेष महत्व: बता दें कि हरिद्वार की नारायणी शिला को पितृ कर्म के लिए विशेष महत्व वाला तीर्थ माना जाता है. मंदिर की मान्यता और इससे जुड़ी पौराणिक कथा इसे दूसरे पितृ तीर्थों से अलग पहचान देती है.

धार्मिक मान्यता के अनुसार, बिहार के गया में जहां भगवान विष्णु के चरण माने जाते हैं, तो वहीं हरिद्वार की नारायणी शिला को भगवान विष्णु का हृदय स्थल माना गया है. जबकि, बदरीनाथ के बद्रिकाश्रम में भगवान का मस्तक विराजमान है. इसी कारण इन तीनों स्थलों पर यहां पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मकांड का विशेष महत्व बताया जाता है.

गयासुर की कथा से जुड़ा है नारायणी शिला का इतिहास: नारायणी शिला मंदिर की पौराणिक कथा गयासुर राक्षस और भगवान विष्णु से जुड़ी है. प्राचीन नारायणी शिला (प्रेत शिला) मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज कुमार त्रिपाठी के मुताबिक, वायु पुराण के वर्णन है कि नारद जी की प्रेरणा से गयासुर नाम का राक्षस भगवान विष्णु से बैर करने के लिए बद्रिकाश्रम गया था, लेकिन भगवान विष्णु ने उसे दर्शन नहीं दिए. इसलिए गयासुर राक्षस ने वहां से भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हरण कर लेकर भागा था, लेकिन भगवान विष्णु ने उसके केश पकड़कर पटक दिया.

इसी दौरान श्रीविग्रह के अलग अलग हिस्से तीन प्रमुख स्थानों पर गिरे. भगवान विष्णु का मस्तक बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल में, हृदय और कंठ से नाभि तक का हिस्सा हरिद्वार की नारायणी शिला में और चरण बिहार के गया में गिरे थे. कहा जाता है कि गयासुर के भगवान विष्णु के चरणों में पहुंचने के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई. भगवान विष्णु ने आशीर्वाद दिया था कि इन तीन स्थान पर वास करेंगे. जो भी अपने पितरों की पूजा अर्चना यहां करेगा उनके पितरों को मोक्ष प्रदान करेंगे.

एक लोटा जल चढ़ाने से भी पितरों को मिलता है मोक्ष: धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के हृदय में माता लक्ष्मी का निवास है, इसलिए यहां किए जाने वाले श्राद्ध और पितृ कर्म का विशेष महत्व बताया गया है. वैसे तो यहां पर श्राद्ध कर्म, पिंडदान तर्पण और नारायण बलि पूजा जैसे पूजा अर्चना कराई जाती है, लेकिन सच्चे मन से यहां अपने पितरों को याद करते हुए एक लोटा जल चढ़ाने से भी पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है.

पितृ पक्ष में बढ़ जाती है नारायणी शिला में भीड़: नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी मनोज त्रिपाठी ने बताया कि पितृ पक्ष में अपने पितरों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है. नारायणी शिला में श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और नारायण बलि समेत विभिन्न कर्मकांड कराए जाते हैं. पितृ पक्ष के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त कर्म कराने के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं.

सर्व पितृ अमावस्या पर मंदिर में मेला लगता है और दूर-दूर से लोग यहां पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं. असम के मुख्यमंत्री हेमंत सरमा बिस्वा सरमा भी इसी मंदिर में पूजा अर्चना करने हर साल आते हैं. लिहाजा, पितृ पक्ष शुरू होते ही लोगों का जमावड़ा लगने लग गया है. अब 16 दिन तक यहां रोजाना भक्तों की भीड़ कर्म कांड और श्राद्ध कर्म का सिलसिला जारी रहेगा.

शिला के रूप में विराजमान है भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का हिस्सा: नारायणी शिला मंदिर में भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक का हिस्सा शिला के रूप में विराजमान है. जहां पितृ कर्म करने के बाद पूजा अर्चना की जाती है. इसके अलावा पूर्व में मंदिर में लोगों के पितरों के नाम के स्थान बनाए जाते थे. मंदिरनुमा स्थान के कारण पूरा मंदिर परिसर भर गया है. इसलिए अब स्थान नहीं दिया जाता.

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